Monday, August 8, 2022
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उत्तरप्रदेश सारनाथ वाराणसी घूमने की संपूर्ण जानकारी

सारनाथ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य पूर्वी भाग में स्थित वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है | यह स्थान बौद्ध एवं जैन धर्म के  तीर्थ यात्रियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है | गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था| इस उपदेश को लोग धर्म चक्र प्रवर्तन कहते हैं|

मेरे प्रिय पाठक आपका प्रेम पूर्वक नमस्कार हमारे इस लेख को पढ़ने के लिए| इस लेख में वाराणसी के पास सारनाथ पर्यटक स्थल का संपूर्ण वर्णन करेंगे, सारनाथ भगवान बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली है| मैं आशा करता हूं कि इस लेख को पूरा अंत तक पढ़ेंगे  जिससे कि आपको संक्षेप में जानकारी मिल जाए |

 सारनाथ का परिचय और सारनाथ में घूमने वाली जगह :

  • सारनाथ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य पूर्वी भाग में स्थित वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है | यह स्थान बौद्ध एवं जैन धर्म के  तीर्थ यात्रियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है| गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था| इस उपदेश को लोग धर्म चक्र प्रवर्तन कहते हैं |
  • यह स्थान बौद्ध धर्म के चार तीर्थ स्थानों में से एक है| बाकी तीर्थ स्थान इस प्रकार है -लुंबिनी, बोधगया और कुशीनगर|इसी स्थान पर महान भारतीय सम्राट अशोक ने कई स्तूप बनवाए थे। उन्होंने यहां प्रसिद्ध अशोक स्तंभ का भी निर्माण करवाया, जिनमें से अब कुछ ही शेष बचे हैं। इन स्तंभों पर बने चार शेर आज भारत का राष्ट्रीय चिन्ह है। वहीं स्तंभ के चक्र को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में देखा जा सकता है।
  • दोस्तों सारनाथ में डियर पार्क स्थित है यही वह जगह है जहां पर भगवान गौतम बुद्ध ने प्रथम उपदेश दिया था| डियर पार्क में स्थित धम्मेक स्तूप वो जगह है, जहां पर गौतम बुद्ध ने ‘आर्य अष्टांग मार्ग’ का संदेश दिया था। सारनाथ म्यूजियम में भी खुदाई के दौरान मिली शिल्पकृतियों को रखा गया है। यहां के पर्यटन स्थलों में एक नाम हाल ही में जुड़ा है। यह है मूलगंध कुटी बिहार, जिसे 1931 में महा बोधि सोसाइटी ने बनवाया था। यहाँ सावन  के महीने में हिंदुओं का मेला लगता है|

सारनाथ का इतिहास – 

 

  • इसका प्राचीन नाम ऋषिपतन था|आधुनिक नाम सारनाथ की उत्पत्ति “सारंगनाथ” (मृगों के नाथ) अर्थात् गौतम बुद्ध से हुई| गौतम बुद्ध के प्रथम उपदेश (लगभग 533 ई.पू.) से 300 वर्ष बाद तक का, सारनाथ का इतिहास अज्ञात है|क्योंकि उत्खनन से इस काल का कोई भी अवशेष नहीं प्राप्त हुआ है।
  • सारनाथ की समृद्धि और बौद्ध धर्म का विकास सर्वप्रथम अशोक के शासनकाल में होता है। उसने सारनाथ में धर्मराजिका स्तूप, धमेख स्तूप एवं सिंह स्तंभ का निर्माण करवाया। अशोक के उत्तराधिकारियों के शासन-काल में पुन: सारनाथ  उन्नति  की ओर  बढ़ने लगा । प्रथम शताब्दी ई. के लगभग उत्तर भारत के कुषाण राज्य की स्थापना के साथ ही एक बार पुन: बौद्ध धर्म की उन्नति हुई।
  • हर्ष  के शासन-काल में ह्वेन त्सांग भारत आया था। उसने सारनाथ को अत्यंत खुशहाल बताया था। हर्ष के बाद कई सौ वर्ष तक सारनाथ विभिन्न शासकों के अधिकार में था लेकिन इनके शासनकाल में कोई विशेष उपलब्धि नहीं हो पाई। महमूद गजनवी के वाराणसी आक्रमण के समय सारनाथ को अत्यधिक क्षति पहुँची। पुन:  सम्राट महीपाल के शासन काल में स्थिरपाल और बसन्तपाल नामक दो भाइयों ने सम्राट की प्रेरणा से काशी के देवालयों के उद्धार के साथ-साथ धर्मराजिका स्तूप एवं धर्मचक्र का भी उद्धार किया। गाहड़वाल वेश के शासन-काल में गोविंदचंद्र की रानी कुमार देवी ने सारनाथ में एक विहार बनवाया था। उत्खनन से प्राप्त एक अभिलेख से भी इसकी पुष्टि होती है। इसके पश्चात् सारनाथ की वैभव का अंत हो गया। 
  • 19 वीं शताब्दी के मध्य में सारनाथ को कुछ ब्रिटिश पुरातत्वविदों द्वारा इसके ऐतिहासिक महत्त्व के चलते फिर से संरक्षित किया गया और  बौद्ध धर्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक का स्थान सारनाथ ने फिर से प्राप्त किया।

सारनाथ के पर्यटक स्थल –  

सारनाथ में घूमने वाले पर्यटक स्थल कई सारे हैं पर उनमें से हम कुछ महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल के बारे में जानकारी दे रहे हैं| जो इस प्रकार हैं-

  1. अशोक स्तंभ.
  2. मूलगंध कुटी विहार.
  3. चौखंडी स्तूप.
  4. सारनाथ का पुरातत्व संग्रहालय.
  5. धर्मराजिका स्तूप.
  6. थाई मंदिर सारनाथ.
  7. तिब्बती मंदिर सारनाथ.
  8. डियर पार्क.

1. अशोक स्तंभ सारनाथ –      

                    

  • दोस्तों अशोक स्तंभ उत्तर भारत में मिलने वाले श्रृंखलाबद्ध  स्तंभ को सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में बनवाया था | स्तंभ की लगभग ऊंचाई 40 से 50 फीट है वैसे तो कई अशोक स्तंभ का निर्माण किया गया था ,पर आज शिलालेख के साथ सिर्फ 19 ही शेष बचे हैं| इन सब में से सारनाथ का अशोक स्तंभ सबसे फेमस (प्रसिद्ध) है| धम्मेक स्तूप के साथ यह 50 मीटर लंबा स्तंभ ,अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के लिए  उपहार है। अशोक स्तंभ महान सम्राट अशोक द्वारा 250 ईसा पूर्व में सारनाथ में बनवाया गया।
  • सारनाथ के स्तंभ में चार शेर एक दूसरे से पीठ से पीठ सटा कर बैठे हुए है।दोस्तों भारत ने इस स्तम्भ को अपने राष्ट्र चिन्ह  के रूप में अपना लिया है| यह चार शेर शक्ति, शौर्य, गर्व और आत्वविश्वास के सूचक हैं। स्तंभ के निचले भाग में बना अशोक चक्र 1950 से राष्ट्रीय ध्वज की शान बढ़ा रहा है। अशोक स्तंभ तुर्की आक्रमण के दौरान टूट गया था और उस मूल स्थान पर केवल आधार ही बचा है, टूटा हुआ हिस्सा अब सारनाथ संग्रहालय में प्रदर्शन हेतु रखा गया है। 
  • अशोक स्तंभ मुख्य मंदिर से पश्चिम की ओर स्थित है| इसकी प्रारंभ में ऊंचाई  17.55 मीटर (55 फुट) थी| वर्तमान में  इसकी  ऊंचाई लगभग 2.03 मीटर (7 फुट 9 इंच) है।अशोक स्तंभ पर तीन लेख उल्लिखित हैं। पहला लेख अशोक  कालीन ब्राह्मी लिपि में है । दूसरा लेख कुषाण-काल का है। तीसरा लेख  गुप्त काल का है| 

2. मूलगंध कुटी विहार – 

  • यह विहार धर्मराजिका स्तूप से उत्तर की ओर स्थित है।  इस विहार की कुर्सी चौकोर है जिसकी एक भुजा 18.29 मी. है। सातवीं शताब्दी में भारत-भ्रमण पर आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इसका वर्णन 200 फुट ऊँचे मूलगंध कुटी विहार के नाम से किया है। इस मंदिर पर बने हुए नक़्क़ाशीदार गोले और  छोटे-छोटे स्तंभों तथा सुदंर कलापूर्ण कटावों आदि से यह निश्चित हो जाता है कि इसका निर्माण गुप्तकाल में हुआ था।परंतु इसके चारों ओर मिट्टी और चूने की बनी हुई पक्की फर्शों तथा दीवालों के बाहरी भाग में प्रयुक्त अस्त-व्यस्त नक़्क़ाशीदार पत्थरों के आधार पर कुछ विद्धानों ने इसे 8वीं शताब्दी के लगभग का माना है।
  • इस मंदिर के बीच में बने मंडप के नीचे प्रारंभ में भगवान बुद्ध की एक सोने की चमकीली मूर्ति स्थापित थी। मंदिर में प्रवेश के लिए तीनों दिशाओं में एक-एक द्वार और पूर्व दिशा में मुख्य प्रवेश द्वार था। समय के अनुसार जब मंदिर की छत कमज़ोर होने लगी तो उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भीतरी दक्षिणापथ की  दीवारें उठाकर बन्द कर दिया गया। आने जाने का रास्ता केवल पूर्व के मुख्य द्वार से ही रह गया। तीनों दरवाजों के बंद हो जाने से ये कोठरियों जैसी हो गई, जिसे बाद में छोटे मंदिरों का रूप दे दिया गया। ये वही मंदिर है, जहाँ बुद्ध ने अपनी पहली वर्षा ऋतु देखी थी। 
  • 1931 में इसे महा बोधि सोसाइटी ने बनवाया था। मंदिर के अंदर बेहद प्रभावशाली डिजाइन और पैटर्न बने हुए हैं। मंदिर में एक बोधि पेड़ भी है, जिसे श्रीलंका के एक पेड़ से प्रतिरोपण के जरिए यहां लगाया गया था। 

3. चौखंडी स्तूप –

 

  • चौखंडी स्तूप बौद्ध समुदाय के लिए काफी पूजनीय है। यहां गौतम बुद्ध से जुड़ी कई निशानियां हैं। ऐसा माना जाता है कि चौखंडी स्तूप का निर्माण मूलत: सीढ़ीदार मंदिर के रूप में किया गया था| चौखंडी स्तूप के पास में ही अशोक स्तंभ, धमेख स्तूप, धर्माजिका स्तूप, धर्मचक्र स्तूप और मूलगंध कुटी मंदिर हैं।
  • मेरे प्रिय पाठक , इसी  इसी स्थान पर भगवान गौतम बुद्ध ने पांचों शिष्यों को प्रथम उपदेश यहीं पर सुनाया था| इस स्तूप का निर्माण ठीक उसी जगह पर किया गया है, जहाँ महान भगवान बुद्ध की मुलाकात अपने पांच शिष्यों से हुई थी।इस स्तूप के ऊपर एक अष्टपार्श्वीय बुर्जी बनी हुई है। इसके उत्तरी दरवाजे पर पड़े हुए पत्थर पर फ़ारसी में एक लेख उल्लिखित है|गुप्तकाल में इस प्रकार के स्तूपों को ‘त्रिमेधि स्तूप’ कहते थे। उत्खनन से प्राप्त सामग्रियों के आधार पर यह निश्चित हो जाता है कि गुप्तकाल में इस स्तूप का निर्माण हो चुका था।चौखंडी स्तूप जाने के बाद पर्यटकों को एक अलग शांति की प्राप्ति होती जो बेहद अद्भुद है।

 

4. सारनाथ का पुरातत्व संग्रहालय – 

 

  • कुछ समय बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया और उत्तर भारत में कई स्तंभ और स्तूप का निर्माण करवाया, जिनमें से कुछ सारनाथ में स्थित है।सारनाथ संग्रहालय की स्थापना 1904 ई. में हुई थी | पुरावस्‍तुओं को रखने, प्रदर्शित करने और उनका अध्‍ययन करने के लिए यह भवन 1910 में बनकर तैयार हुआ। 
  • यह बहुत छोटा संग्रहालय है, लेकिन बहुत खास चीजों को ही यहाँ रखा गया है। यहाँ कुल 6,832 चीजें रखी गयी हैं।यह सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक ही खुला रहता है और शुक्रवार को बंद रहता है।इसमें ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच के बुद्ध कला के बेहतरीन नमूने शामिल हैं। 

 

5. धर्मराजिका स्तूप – 

  • इस स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था| जब यह बना था तब  इस स्तूप  का व्यास 13.49 मीटर (44 फुट 3 इंच) था। बाद के समय में 6 बार इस स्तूप में परिवर्तन किया गया, जिसमें इसके चारों ओर का परिक्रमा पथ और चारों दिशाओं से इसकी छत पर ले जाने वाली सीढ़ियाँ प्रमुख थीं।  

 

  • दुर्भाग्यवश 1794 ई. में जगत सिंह के सैनिकों  ने काशी का मोहल्ला जगतगंज बनाने के लिए इसकी ईंटों को खोद डाला था।उस समय  खुदाई में 8.23  मीटर की गहराई पर एक प्रस्तर पात्र के भीतर संगरमरमर की मंजूषा में कुछ हड्डिया एवं  मोती के दाने तथा रत्न मिले थे, जिसे उन्होंने विशेष महत्त्व मानकर गंगा में प्रवाहित कर दिया।

 

6. थाई मंदिर सारनाथ – 

 

 

  • सारनाथ एक प्रमुख बौद्ध तीर्थ स्थल होने के नाते  विश्व के कोने- कोने से यहां श्रद्धालू आते हैं। सबसे ज्यादा जापान, थाईलैंड और चीन जैसे बौद्ध धर्म प्रधान देशों से आते हैं। इन देशों के अधिकांश लोगों के सारनाथ में मंदिर है। थाई मंदिर का निर्माण एक थाई समुदाय ने करवाया था। यह मंदिर थाई बौद्ध महंतों के द्वारा संचालित किया जाता है। इसे एक खूबसूरत गार्डन में बनाया गया है, जो कि एक शांत और एकांत जगह है।इस मंदिर में घूमने पर मन बिल्कुल प्रसन्न हो जाता है |
  • थाई मंदिर का प्रवेश द्वार शानदार बना है, प्रवेश द्वार से लेकर मंदिर के मुख्य भवन की बनावट में थाईलैंड संस्कृति की झलक साफ – साफ दिखाई देती है| मुख्य भवन के सामने ही चार शेरों की मूर्ति और अशोक चक्र भी बना हुआ है|मंदिर परिसर में ही एक पीपल के पेड़ के नीचे महात्मा  बुद्ध की सुनहरे रंग की प्रतिमा बनी है|

 

7. तिब्बती मंदिर सारनाथ – 

 

  • तिब्बती मंदिर सारनाथ के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। इस मंदिर में बुद्ध की एक मूर्ति है। यहां मंदिर की ईमारत के बाहर आप प्रार्थना पहियों को देख सकते हैं जिन्हें घड़ी की दिशा में घुमाया जाता है आपको बता दें कि इस मंदिर में थाईलैंड, तिब्बत, चीन, और जापान से भारी संख्या में तीर्थ यात्री और बौद्ध विद्वान आते हैं।
  • काग्यु तिब्बती मठ सारनाथ में सबसे बड़ा मठ है और इसे बोध गया के पास स्थित नालंदा मनैस्टिक इंस्टीट्यूट की शैली में बनाया गया है। इस समय संस्था में 15 महंत और 4 योगिन हैं, जो यहां रहकर अध्ययन करते हैं।

 

8. डियर पार्क – 

 

  • मेरे  प्रिय पाठक अगर आप डीयर पार्क घूमने जाएं, तो यहां से 1 किलोमीटर दूर स्थित गांव सिंहपुर जरूर जाएं। यह गांव जैन धर्म के 11वें तीर्थाकर श्रेयांसनाथ का जन्म स्थान है। उन्हें  यहां समर्पित एक मंदिर भी है और यह जैन समुदाय का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। बौद्ध धर्म को मानने वालों में डीयर पार्क का खास महत्व है। 
  • सारनाथ में डियर पार्क ऐसा स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था और यही पर मूल संघ बनाया गया था। प्रसिद्ध चीनी भिक्षु और विश्व यात्री ह्वेन त्सांग के अनुसार, डियर पार्क बनारस के जातक राजा द्वारा विकसित किया गया था। इस पवित्र स्थल का इतिहास 528 ईसा पूर्व का है।
  • एक विशाल बाड़े के रूप में बना है डियर पार्क जिसमें हिरन आजादी से घूमते हैं | यह जगह उन लोगों के लिए स्वर्ग है, जो अपने व्यस्त जीवन शैली से दूर एकांत और शांति की इच्छा रखते है। यहाँ का वातावरण शांत और आरामदायक है। 

सारनाथ घूमने का सबसे अच्छा समय क्या है – 

 

  • अपने सुविधानुसार कभी भी यहां जा सकते हैं लेकिन सर्दी के मौसम में घूमना सबसे अच्छा है सारनाथ |अप्रैल से सितंबर तक इस जगह पर न जाना ही अच्छा होगा क्योंकि इस क्षेत्र में चिलचिलाती गर्मी आपको परेशान कर सकती है।

सारनाथ कैसे पहुंचा जाये – 

  • अगर आप वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन पहुंच गए हैं तो वहां से सारनाथ जाना बहुत आसान है मात्र यहां से सारनाथ  (via NH31) 9किलोमीटर की दूरी पर स्थित है| आप किसी भी बस या अपनी कैब बुक कर के जा सकते हैं|
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